ख़ुद पे " धूल " जमी थी बहुत ... झाड़ा तो कुछ रिश्ते मिले ... पुरानी हँसी कुछ क़िस्से और गिले ... कुछ अधूरे एहसास ... कुछ अधूरी बातें जो बीच में ही रह गयी पर थी बहुत ख़ास ... ख़ुद को झाड़ लेना चाहिए वक़्त रहते " वरना "... " धूल " कभी कभी " शूल " की तरह चुभती रहती है !!!
समझदारों ने समाज बना डाला नियम कानून रीति रिवाज़ लिख डाला नियुक्ति की पंडितों मौलवियों और पादरियों की इन सबको धर्म का ठेकेदार बना डाला बिना डिग्री बिना क्वालिफिकेशन बिना वोट का ये इलेक्शन वाह रे वाह अद्धभुत सेलेकेशन बिना इंसान और इंसानियत के कैसा धर्म और कैसा समाज बात बात पे करते क्यों हो इतना विवाद