Skip to main content

ख़ुद पे धूल

ख़ुद पे "धूल" जमी थी बहुत...
झाड़ा तो कुछ रिश्ते मिले...
पुरानी हँसी कुछ क़िस्से और गिले...
कुछ अधूरे एहसास...
 कुछ अधूरी बातें जो बीच में ही रह गयी 
पर थी बहुत ख़ास... 
ख़ुद को झाड़ लेना चाहिए वक़्त रहते 
"वरना "...
"धूल" कभी कभी "शूल"की तरह चुभती रहती है !!!

Comments

Popular posts from this blog

जर्सी No.7 - COMING SOON

जर्सी No.7 ऐसे क्रिकेट खिलाड़ी की कहानी है जिसका जुनून, सनक, पागलपन, बौखलाहट, उधेड़बुन, ख़्वाहिश, आरज़ू, उम्मीद, सफलता सिर्फ़ और सिर्फ़ उसका खेल। दूसरी तरफ एक ज़िम्मेदार पुत्र की तरह परिवार के लिए ख़ुद के जुनून को जलाकर उसकी भस्म की अग्नि को हृदय में लिए जिए जा रहा है।  

मेरी आवाज़ में ये जो शोर है

मेरी आवाज़ में ये जो शोर है...  ये मैं नहीं कोई और है....  काय काय करता जिस्म चितचोर है....  चारों तरफ मचा कोलाहल ये कैसा दौर है। ... - चीची 

मैं बहुत रोया !!!

मैं बहुत रोया मैं बहुत रोया अपनो में गैर होके मैं बहुत रोया मैं बहुत रोया दर्द की चादर ओढ़कर सिसक भरी करवटें लेकर आह की साँस भर भर के मैं बहुत रोया मैं बहुत रोया