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मौसम की तबियत

शहर की हवा कुछ नासाज़  लगती है   मौसम का मूड और तबियत आज फिर ख़राब लगती है  अजीब ही किरदार है पल में शोला पल में शबनम  कभी बहुत हँस  हँस के बात करता है तो बिजलियाँ चमकती हैं  तो कभी सीधे मुँह जवाब तक नहीं देता   और महीनो मिलता तक नहीं  बादलों  के साथ दूर दूर दूर  कभी   क्रीड़ा करता हुआ दिख जाता  है  आवाज़ लगाता हूँ तो अनसुना करके और दूर चला जाता है  इसको मनाने  के तरीके ढूंढ़ता हूँ पर वो अपनी ही धुन में रहता है  जब मन करता है तभी आता है और जाता है  मौसम भी अजीब किरदार है। .... 

ख़ुद पे धूल

ख़ुद पे " धूल " जमी थी बहुत ... झाड़ा तो कुछ रिश्ते मिले ... पुरानी हँसी कुछ क़िस्से और गिले ... कुछ अधूरे एहसास ...   कुछ अधूरी बातें जो बीच में ही रह गयी   पर थी बहुत ख़ास ...  ख़ुद को झाड़ लेना चाहिए वक़्त रहते   " वरना "... " धूल " कभी कभी " शूल " की तरह चुभती रहती है !!!